रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र

By adarsh

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रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र

 

मान्यता है कि भगवान शिव के भक्त और लोकमान्य रावण ने एक प्रसिद्ध स्तोत्र को रचा था, जिसे “रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र” कहा जाता है। यह स्तोत्र भगवान शिव की महिमा और महादेव के दिव्य रूप की प्रशंसा करता है।

कृपया ध्यान दें कि यह एक विशेषत: प्राचीन साहित्य है और इसमें संस्कृत शब्दों का प्रयोग हुआ है, इसलिए इसकी समझने में कुछ कठिनाइयाँ हो सकती है। निम्नलिखित है, रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र का एक अंश:

 

शिव तांडव

जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले,
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं,
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥

जटाकटाहसं भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी,
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके,
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥

धराधरेन्द्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर,
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुरोन्तरे,
प्रबन्धकोटिकोटिनिषेधनानीरुद्धदुरे॥

प्रबन्धकोटिकोटिनिषेधनानीरुद्धदुरे,
वपुषि विमुक्तदिव्यसर्वमनोरथचूरे।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरे,
मामिणीमण्डितविक्षणमण्डलधीवितीने॥

माणिक्यमौलिमण्डितगङ्गातरङ्गकौस्तुभे,
चकारुन्दमुखैर्विद्मतिमिताधिमतिस्तवे।
विचित्ररत्नस्तबकैर्मकरन्दलवितानैः,
मणीमण्डितश्रियकौरवकुण्डलमण्डितैः॥

मणीमण्डितश्रियकौरवकुण्डलमण्डितैः,
मणीगणान्तरीतदमण्डिताकिरीटकैः।
मन्दारकुन्दलमण्डितश्रियकुण्डलमण्डितैः,
कर्णपूरकर्णतदीतकृपाकर्णतांबूलैः॥

कर्णपूरकर्णतदीतकृपाकर्णतांबूलैः,
धूतपापदीपदूरनीलजितकुञ्तलैः।
स्यामासमासमानसमानसमानं मनः,
सहचरारममेत्यचरामि यत्र कुत्र।

न मे धनं न जनं सुन्दरीम्,
कविताम् वाग्विशेषम्,
न वाक्पातुरीम्।
शिवशिवं भजे शिवशिवं भजे,
शिवशिवं भजे शिवशिवं भजे॥

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
परेषां च सुप्रतिकूलानि यत्नान्न विचारेत्।
आपद्यमानमरणं विद्यादेव यथा तथा।
नास्ति बुद्धिमतां सत्त्वे योगः सद्यो यथापतः॥

प्रबलानीचरानि नमो नमः।
भूतपतये नमो नमः।
यक्षाधिपाय नमो नमः।
नमो नमो नमः॥

शिव तांडव स्तोत्र को सरल भाषा में

Picsart 23 12 30 21 23 29 061कृपया ध्यान दें कि यह स्तोत्र उस समय की भाषा, संस्कृति और मान्यताओं का परिचय देता है, और यह भगवान शिव के प्रति रावण की भक्ति का प्रतीक हो सकता है।

भगवान शिव के प्रति रावण की भक्ति विशेष और अद्वितीय थी। इस स्तोत्र में उन्होंने भगवान शिव के विभिन्न रूपों, गुणों और महत्व की महिमा का बखान किया है। स्तोत्र के शब्द और भावनाएँ उनकी भक्ति और श्रद्धा का प्रतिष्ठान करते हैं।

यह स्तोत्र शिव तांडव के माध्यम से भगवान शिव की शक्ति, वीरता, और आदित्यता को प्रकट करता है। रावण की अद्वितीय दृष्टिकोण से, यह स्तोत्र उनके आत्मा की गहरी आदर्शता को प्रकट करता है जो उन्हें भगवान शिव के प्रति जुड़ती है।

यह स्तोत्र संस्कृत भाषा में है और उसकी व्याकरणिक रचना अधिक परंपरागत भाषा का पालन करती है। यहाँ तक कि उसमें नामोंं के अनेक रूपों का प्रयोग किया गया है, जो शिव की अनंत गुणों को प्रकट करते हैं।

यह स्तोत्र भगवान शिव के दिव्यता और महिमा को व्यक्त करने वाला एक महत्वपूर्ण प्राचीन शैली का उदाहरण है, जो रावण की अद्वितीय भक्ति को प्रकट करता है।

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र के माध्यम से उन्होंने भगवान शिव की अनंत शक्तियों और गुणों की प्रशंसा की है। स्तोत्र की विशेषता यहाँ तक है कि यह रावण के आंतरिक भावनाओं की प्रकटि है, जो उन्हें महादेव के प्रति गहरे श्रद्धाभाव की ओर ले जाती है।

यह स्तोत्र संस्कृति और धार्मिक विचारधारा की महत्वपूर्ण झलकियों को प्रस्तुत करता है। इसमें भगवान शिव की महत्वपूर्ण भूमिका, उनके विभिन्न रूपों की महत्वपूर्णता, और ध्यान के महत्व का वर्णन किया गया है।

रावण की भक्ति का यह प्रतीक है कि भगवान की उपासना में कोई भी व्यक्ति, चाहे वो किसी भी योग्यता या परिस्थिति में हो, उनके प्रति दिव्य आदर्शता और आवश्यकता को समझ सकता है।

इस स्तोत्र के माध्यम से, हमें यह सिखने को मिलता है कि भगवान की उपासना का एक अद्वितीय तरीका हर व्यक्ति के आदर्श और आवश्यकताओं के आधार पर हो सकता है। रावण द्वारा रचित यह स्तोत्र एक गहरे आदर्श की प्रतिनिधि है जो हमें भगवान की प्रेम और भक्ति की महत्वपूर्णता को समझाता है।

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र के माध्यम से हमें यह सिखने को मिलता है कि भक्ति की महत्वपूर्णता और अर्थ केवल धार्मिक नहीं होता है, बल्कि यह व्यक्ति के आंतरिक अनुभव और आदर्शों के साथ जुड़ा होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति की भावनाओं, उनके संवेदनशीलता के साथ खिलवाड़ कर भगवान की उपासना की गहराई को दर्शाता है।

रावण की भक्ति की अद्वितीयता यहाँ तक जाती है कि वे उनके चारित्रिक और व्यक्तिगत गुणों के माध्यम से शिव की प्रेम और उनकी दिव्यता को समझते थे। यह स्तोत्र उनके संवादों में एक आदर्श संबंध की प्रतीक्षा करता है, जो हमें यह दिखाता है कि भगवान के साथ साक्षात्कार में व्यक्ति की भक्ति और समर्पण की कैसी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

इस स्तोत्र में व्यक्त रूप से बताया गया है कि रावण ने कैसे उनके चरणों में विश्वास और श्रद्धा की गहरी भावना से भगवान की पूजा की थी। उनकी इस आदर्शता और उनके आंतरिक जीवन के माध्यम से व्यक्त होने वाली भक्ति और उनकी भावनाओं की प्राकृतिकता हमें यह सिखाती है कि भगवान की प्रेम की असीमता और व्यक्तिगतता के साथ कैसे जुड़ती है।

इस प्रकार, रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र हमें भगवान के प्रति अपनी अनूठी भक्ति के माध्यम से उनकी आदर्शता और साधना की महत्वपूर्णता को समझाता है।

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र के माध्यम से हमें यह सिखने को मिलता है कि भक्ति की महत्वपूर्णता और अर्थ केवल धार्मिक नहीं होता है, बल्कि यह व्यक्ति के आंतरिक अनुभव और आदर्शों के साथ जुड़ा होता है। यह स्तोत्र व्यक्ति की भावनाओं, उनके संवेदनशीलता के साथ खिलवाड़ कर भगवान की उपासना की गहराई को दर्शाता है।

रावण की भक्ति की अद्वितीयता यहाँ तक जाती है कि वे उनके चारित्रिक और व्यक्तिगत गुणों के माध्यम से शिव की प्रेम और उनकी दिव्यता को समझते थे। यह स्तोत्र उनके संवादों में एक आदर्श संबंध की प्रतीक्षा करता है, जो हमें यह दिखाता है कि भगवान के साथ साक्षात्कार में व्यक्ति की भक्ति और समर्पण की कैसी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

इस स्तोत्र में व्यक्त रूप से बताया गया है कि रावण ने कैसे उनके चरणों में विश्वास और श्रद्धा की गहरी भावना से भगवान की पूजा की थी। उनकी इस आदर्शता और उनके आंतरिक जीवन के माध्यम से व्यक्त होने वाली भक्ति और उनकी भावनाओं की प्राकृतिकता हमें यह सिखाती है कि भगवान की प्रेम की असीमता और व्यक्तिगतता के साथ कैसे जुड़ती है।

इस प्रकार, रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र हमें भगवान के प्रति अपनी अनूठी भक्ति के माध्यम से उनकी आदर्शता और साधना की महत्वपूर्णता को समझाता है।

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